उत्तराखण्ड में जान लेवा होता कोरोना, बेफ्रिक सरकार - Devbhhomi News
शासन के अटपटे बयान, आफत में जनता की जान
देहरादून। वैश्विक महामारी कोरोना दिल्ली की तरह उत्तराखण्ड में भी अपने पैर पसारने लगी है। एक ही दिन में 10 जाने जाना भविष्य में उत्पन्न होने वाली एक बडी चुनौती की ओर इशारा कर रहे हैं। यह जाने उन परिवारो के लिए जरूरी थी जिनके परिवार के लोग गए हैं। लेकिन शासन प्रशासन, सरकार की नजर में तो गई जाने केवल एक गिनती है। लेकिन जिन परिवारो के सदस्य गए हैं उनसे पूछो जाने वाला कोई गिनती नही बल्कि उनके परिवार का एक ऐसा हिस्सा था जिसकी कमी कभी पूरी नही की जा सकती। सरकार की लापरवाही के कारण यह जाने जा रही हैं। जिस समय पूरे देश मे सख्त लोकडाउन की आवश्यकता थी उस समय अनलॉक-3 घोषित किया गया है। जब देश में दर्जनो कोरोना के केस थे उस समय तो सरकार ने पहले एक दिन का जनता कफ्र्यू घोषित कर दिया और इस जनता कफ्र्यू के सफल होते ही अगले ही दिन लॉकडाउन घोषित कर दिया गया। फिर दो महीने तक पूरा देश थम सा गया।
हर कोई घरो में बंद हो गया। सडको पर केवल एक ही शब्द पढने को मिलता था जिसमें लिखा होता था ‘को-रो-ना’ यानि कोई रोड पर ना हो। इन शब्दो को इस ढंंग से लिखा जाता था कि पढने वाले के दिल में दहशत कायम हो जाती थी। ऊपर से पुलिस का डंडा तो था ही, जो सडक पर दिखाई देता उसे मूर्गा बना दिया जाता या फिर उससे उठक बैठक करायी जाती। कुल मिलाकर आम जन को घरो में ही रहने की नसीयत दी जाती थी। इसके पीछे मकसद केवल इतना था कि कोरोना की चेन को तोडा जाए। यह चेन टूटी तो नही लेकिन इतना जरूर हुआ कि जब पूरे देश में कोरोना को लेकर हा-हाकार मचा हुआ था उस समय एक तब्लीगी जमात का मामला उछला और उसके बाद प्रवासियों का। इन दोनो मामलो ने पूरे देश में कोरोना के हजारो केसो को लाखो में बदल दिया। तब्लीगी जमात हो या फिर प्रवासियो का मामला। इनसे भी सरकार ने सबक नही सिखा। एक-एक कर अनलॉक घोषित होते चले गए और आज हम अनलॉक-3 में चल रहे हैं। स्कूल, कालेजो, कोचिंग संेटरो को छोडकर बाकी सब कुछ पूर्व की तरह खुल चुका है और जनता को उसके हाल पर छोड दिया गया है। उत्तराखण्ड के नवनियुक्त मुख्य सचिव का हाल ही में बयान पढने को मिला था जिसमें उन्होने कहा था कि ‘कोविड-19 महामारी को लेकर सरकार बहुत सख्त नही हो सकती। उसे आर्थिक गतिविधियों को भी जारी रखना है। दो महीने के लॉकडाउन में काफी नुकसान हुआ है। जीएसटी का 80 प्रतिशत लक्ष्य ही प्राप्त कर सके। इसलिए संतुलन बनाते हुए अनलॉक की प्रक्रिया अपनायी जा रही है। सूबे के मुख्य सचिव बेशक आर्थिक गतिविधियो को जारी रखने की बात कह रहे हो लेकिन अब यह भी समझना होगा कि सब कुछ आर्थिक गतिविधियां नहीं है। जब जनता बचेगी तभी तो आर्थिक गतिविधियां काम आयेंगी। जब जनता की नही होगी तो राजकोष के भरे होने का भी क्या फायदा। कमाल की बात तो यह है कि सरकार ने कोरोना से बचने के उपायो को सख्ती से लागू करने की जिम्मेदारी भी संबंधित जिला प्रशाान के हवाले कर दी है जबकि पूर्व की तरह सरकार को अपने हाथो मे ही नियम कायदो को लागू करने की जिम्मेदारी रखनी चाहिए थी। सोशल डिस्टेंसिंग की बात हो या फिर मुंह पर मास्क लगाने की। किसी भी नियम का ना तो नेता पालन कर रहे हैं और न ही आम जन। उत्तराखण्ड में सत्तारूढ पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत तक न ही सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हैं और नही मुंह पर मास्क लगाते हैं
इसका उदाहरण विगत माह उस समय देखने को मिला था जब भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत ने उत्तराखण्ड में शूट होने वाली फिल्म विष के मुर्हूत शॉट को क्लेप दिया था। इस कार्यक्रम में वह बिना मास्क के 11 लोगो को बीच खडे हुए दिखायी दिए थे। सोशल डिस्टेंसिंग की बात तो हवा में उडती हुयी दिखायी दी थी। सभी लोग एक दूसरे से सटे हुए खडे थे। जब इस कार्यक्रम की फोटो मीडिया में जारी हुयी तो विपक्ष ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को घेरने की कोशिश भी की थी। कांग्रेस पार्टी ने तो उनके खिलाफ मुकदमा दायर करने की मांग भी उठायी थी।लेकिन कांग्रेस पार्टी खुद कोरोना काल में नियमो की धज्जियां उडाती हुयी नजर आती है। इसलिए उनकी मांग की तरफ किसी ने गौर नही किया। हाल ही में बिजली घोटाले को मुददा बनाकर महानगर कांग्रेस पार्टी ने एक प्रदर्शन किया था जिसमें दो चार कार्यकर्ताओ को छोडकर किसी ने भी मास्क नही लगाया और एक दूसरे के बगल में खडे होकर प्रदर्शन किया। यह अकेला कार्यक्रम नही था इससे पहले भी कांग्रेस पार्टी ऐसे कई कार्यक्रम आयोजित कर चुकी है। बात यही खत्म नही होती शिव सेना हो, या फिर क्षेत्रीय दल उत्तराखण्ड क्रांति दल हर कोई सोशल डिस्टेसिंग व मुंह पर मास्क लगाने के नियम को नही मान रहा है। हर कोई अपने कार्यक्रम में दोनो नियमो को हवा में उडाते हुए नजर आते हैं। बात यदि नियम के पालन की कि जाए तो सरकार से लेकर शासन तक बैठको में ही नियम का पालन कराने के निर्देश देता हुआ नजर आता है। राजधानी देहरादून का गोविंदगढ क्षेत्र हो या फिर कांवली रोड। दोनो ही जगहो पर घनी आबादी होने के बावजूद इक्का दुक्का आदमी को छोेडकर कोई भी मास्क लगाने को राजी नही है। पुलिस भी इस तरफ गौर नही करती। प्रशासन को केवल मंदिर दिखायी देते हैं। जहां नोटिस जारी कर मुकदमे दर्ज करने की चेतावनी दी जाती है। जबकि शराब के ठेको के बाहर सोशल डिस्टेंसिंग व मास्क पहनने की अनिवार्यता का पालन तक नही होता। लेकिन शराब के ठेको से होने वाली आमदनी के चलते हर कोई इस तरफ गौर तक नही करता। शायद जिम्मेदार यह भूल गए हैं कि वैश्विक महामारी कोरोना से यदि कोई बचा सकता है तो वह ईश्वर है।इसलिए ईश्वर के स्थान पर नोटिस चस्पा करने से पहले यह भी ध्यान रखा जाए कि नियम का पालन मंदिर में तो आसानी से हो जाएगा लेकिन शराब के ठेको में कायदे कानून का पालन कराया जाए तो बात है।
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